चम्पारण गाँधी चम्पारण :)



एडवेंचर कुछ नहीं, सिर्फ़ बुरी तैयारी का नतीजा है ~ रोआल्ड एमंडसन 【जिन्होंने दक्ष‍िणी ध्रुव की खोज की】

 

24-25 सितंबर 2020 🙂


नवम्बर 2018 में लिखा था मैंने: “जब दुविधा में हो तो घूमो- एक कमरे से दूसरे कमरे, एक घर से दूसरे घर, एक गली से दूसरी गली, एक गाँव से दूसरे गाँव, एक शहर से दूसरे शहर, एक राज्य से दूसरे राज्य, एक देश से दूसरे देश, एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव, एक ग्रह से दूसरे ग्रह, एक आकाशगंगा से दूसरी आकाशगंगा, बस घूमो… ‘ब्लैक होल’ के पास नहीं जाना है, उसके बाजू से होके निकलना है”

 

दुविधा में था कि नहीं पता नहीं पर घूमना था, तो शायद किसी दुविधा में होऊँगा। 23 सितंबर को मोतिहारी आ गया अगले दो दिन शहर में बिताने के लिए पर अगले ही दिन माँ से गाँव बात हुई तो माँ कहती हैं कि पापा को बाइक की ज़रूरत है तो मुझे गाँव लौट जाना था 24 सितंबर को ही. पर पापा का काम टल गया और हथिया नक्षत्र की वज़ह तथा ख़राब सड़क की वज़ह से माँ ने गाँव लौटने को मना कर दिया। तब मैंने सोचा गाँव का रास्ता ख़राब है तो क्या हुआ चकिया का रास्ता तो ठीक ही है. मौसी कब से कह रही हैं कि आजा घर जो नया बना है उसे देख जा. बहाना भी था मौसम भी, मैं तो था ही और मेरा Wanderlust{A strong desire to travel.} उफान मार ही रहा था. साथ में अंजली {सोनी: छोटी बहन} को भी मौसी बुला रहीं थीं तो बेमन से ही उसे भी साथ लेना पड़ा. कोई नहीं, उसका साथ में चलना ज़रूरी था….

चलते हैं अब-

24 सितंबर 2020 🙂



अदरक की पहली चाय, बारिश की बूँदें, ओम थानवी जी की किताब से दिन की शुरुआत 🙂







मौसम 😍



गाँधी स्मारक, चन्द्रहिया 🙂



14 महीने पहले जब आया था तब भी इसका काम चालू था अब भी चालू ही है और अभी पता नहीं कब तक चलता रहेगा 😦






श्री कृष्णा जी की ड्यूटी है यहाँ पर स्थानीय लोग बताते हैं कि कृष्णा जी ज़्यादातर वक़्त ताला लगाकर ग़ायब ही रहते हैं, घूमने वाले ऐसे ही बाहर से देख के फ़ोटो और मलाल साथ में लेके जाते हैं!










पिपरा कोठी



अगले ही दिन दीनदयाल जी का जन्मदिन है। मेरे पसंदीदा राजनीतिक व्यक्तित्व में से एक 🙂





 



चकिया जब मौसी के हम पहुँच गए तब अंजली कहती है- “भईया, केसरिया बौद्ध स्तूप चलते हैं ना, बचपन में ही गई थी एक बार” चकिया से केसरिया 25km है, मेरा भी मन हो गया हालाँकि मैं 2 साल पहले ही घूम आया था और जैसी वहाँ की स्थिति है उस हिसाब से दुबारा घूमने लायक जगह नहीं है। पर अंजली ने जैसे कहा तो मना नहीं कर पाया।

साथ में पवन(मौसी का लड़का), राजा(पवन का कजिन), गोलू मामा जी(दूर के मामा जी) हो लिये। एक बाइक पर मैं और अंजली, दूसरे पर वो तीनों और ख़राब सड़क 😭



“केसरिया एक महत्‍वपूर्ण बौद्ध स्‍थल है। यह चंपारण में स्थित एक छोटा सा शहर है जो गंडक नदी के किनारे बसा हुआ है। इसका इतिहास काफी पुराना व समृद्ध है। बौद्ध तीर्थस्‍थलों में इसका महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। बुद्ध ने वैशाली से कुशीनगर जाते हुए एक रात केसरिया में बिताई थी तथा लिच्‍छवियों को अपना भिक्षा-पात्र प्रदान किया था। कहा जाता है कि जब भगवान बुद्ध यहां से जाने लगे तो लिच्‍छवियों ने उन्‍हें रोकने का काफी प्रयास किया। लेकिन जब लिच्‍छवि नहीं माने तो भगवान बुद्ध ने उन्‍हें रोकने के लिए नदी में कृत्रिम बाढ़ उत्‍पन्‍न की। इसके पश्‍चात् ही भगवान बुद्ध यहां से जा पाने में सफल हो सके थे। सम्राट अशोक ने यहां एक स्‍तूप का निर्माण करवाया था। इसे विश्‍व का सबसे बड़ा स्‍तूप माना जाता है।”



 

















गूगल करने पर ये मिलता है-

पूर्वी चम्पारण जिला की भौगोलिक, ऐतिहासिक एवं पुरानत्विक विरासत युगों से रही है। परन्तु 1998 में पुरातत्व अन्वेषण विभाग द्वारा केसरिया में उत्खनन के बाद दुनिया का सबसे ऊँचा बौद्ध स्तूप मिलने के बाद बिहार ने अपने अतीत का गौरव फिर से प्राप्त कर लिया।
केसरिया बौद्ध स्तूप की ऊँचाई आज भी 104 फीट है जबकि इंडोनेसिया स्थित विश्व प्रसिद्ध बोरोबदुर (जावा) बौ़द्ध स्तूप की ऊँचाई 103 फीट है। ये दोनों स्तूप छह तल्ले वाला है जिसके प्रत्येक दिवाक खण्ड में बुौद्ध की मूर्तिया स्थापित है। स्तूप में लगी ईटे मौर्य कालिन है। सभी मूर्तियां विभिन्न मुद्राओं में है। 1861-62 में इस स्तूप के सम्बन्ध में जनील कर्निंधम ने लिखा हैं कि केसरिया का यक स्तूप 200 ई0 से 700 ई0 के मध्य कभी बना होगा। चीनी यात्री फाहियान के अनुसार केसेरिया के देउरा स्थल पर भगवान बुद्ध अपने महापरिनिर्वाण के ठीक पहले वैशाली से कुशीनगर जाने वक्त एक रात का विश्राम किया था तथा साथ आये वैशाली के भिझुकों को अपना भिक्षा पात्र प्रदान कर कुशीनगर के लिए प्रस्थान किया। आज केसरिया बौद्ध स्पूत देखने विदेशों से हजारो हजार पर्यटक एवं बौद्ध भिक्षुक रोज आते है।

हज़ारों… ऐ अम्मा, ई जादा हो गया। एक दिन में मुश्किल से 10-12 जने आते होंगे। बाहर गिनती के दुकान वाले बताते हैं। दुकान वाले ही कहते हैं कि कुछ साल पहले ही इसकी चारदीवारी का निर्माण हुआ है नहीं तो जनता स्तूप तक कब्ज़ा कर चुकी होती।



स्तूप के पेड़ ऐसे विलुप्त हो रहे हैं 😦






























🙈





चलो वापस चकिया, बारिश में भीगते हुए 💃💃💃



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 25 सितंबर 2020 🙂

सुबह उठकर, साईकल की कंडीशन ठीक होने की वज़ह से मोतिहारी से 12km पर पड़ने वाली नदी से मिल आया, जहाँ 2 साल पहले रोज़ जाता है था 🙂





 







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अब गाँधी स्मारक बड़हरवा लखनसेन जाने की तैयारी- साथ में आज पवन(कजिन) चलने वाला था। अंजली और स्नेहा को कैसे भी करके मना किया गया 🙏





 











 







 





ये कुँआँ गाँधी जी के समय का है, हालात देखिए!



ये बरगद का पेड़ भी ऐतिहासिक है। इसी के नीचे गाँधी जी लोगों को पढ़ाते या सम्बोधित करते थें।



उनके द्वारा उपयोग में लाई गई तालाब











 











🙏🙏🙏






















अनिल कुमार जी, संयोग देखिए, हमारे पुलिस थाने के क्षेत्र के ही गाँव के हैं, विज्ञान पढ़ाते हैं और टीचर की कमी का रोना रोते हैं, साथ में यह भी कहते हैं कि शिक्षा को लेकर वर्तमान सरकार का रवैया एकदम उदासीन करने वाला है। अनिल जी चाय बनवाकर लाने की बात कहते हैं, मैं मन कर देता हूँ कि अगली बारे आगे से कहूँगा कि चाय माँगवाइये 😂



सोनालाल राउत जी, ये न होते तो इस जगह के बारे में मुझे कुछ पता नहीं चल पाता। ये यहां प्यून के पोस्ट पर हैं। अपने घर की तीसरी पीढ़ी। इनके दादा जी गाँधी के समय प्यून थे।



इनके दादा जी का उस वक़्त का बैच



सरकार इस स्कूल को +2 बनाने की घोषणा कर चुकी है। निर्माणाधीन भवन की रफ़्तार शून्य ही समझिए।
अब चला जाए यहाँ से 🙂









हम्ममम्म….. कैसे तू इतना ज़रूरी हो गया 🙈





नीरज मुसाफ़िर की किताब केवल फ़ोटो में शामिल करने वास्ते लेकर नहीं चला था, चाय पीते हुए 2 पेज पढ़े हैं, उनसे ये हासिल हुआ कि कैसे लद्दाख जाने के लिए श्रीनगर एयरपोर्ट से आप हाथ पाँव मार के एक कीमती दिन की बचत कर सकते हैं।

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सोनालाल राउत और अनिल कुमार जी ने ही कहा कि मधुबनी आश्रम चले जाइए, रास्ते में ही है, जबकि आश्रम का सोच के नहीं चला था। यहाँ तक कि मैं इस आश्रम को मोतिहारी के ही दूसरे ब्लॉक मधुबन समझता था, जो कि मोतिहारी से अलग दिशा में है।
पर आज भ्रम दूर हुआ और पहुँच गए मधुबनी आश्रम 💃

ये कभी सूत काटने का मुख्य केंद्र होता था। आज खंडहर में तब्दील होता जा रहा है, अभी भी बहुत कुछ का खंडहर होना बाकी है।











ये करना हर सरकार का अधिकार है। 2018 में कुछ पोर्शन को चमका के अपना नाम लिखवा देना है, अभी 2021 में नई सरकार भी आके ऐसा कुछ करेगी, देखना..























ये विनोबा भावे भवन है, ऐसे ही राजेन्द्र प्रसाद भवन भी है। जब ये लोग यहाँ आए थे तो इन्हीं भवनों में ठहरे थे। अब यहाँ कोबरा ठहरते हैं। मुझे ख़ास हिदायत देकर इधर जाने दिया गया कि तेज़ भाग सको तभी जाना।


























कार्यालय का हाल देखिये-













मौजेलाल सिंह जी, यहाँ के केअर टेकर, जिन्हें 500₹ का महीना मिलता है। इनकी मदद(ताला लगाने और खोलने के लिए) इनका पोता रविरंजन जी करते हैं। इंटर में हैं आर्ट्स सब्जेक्ट से। मौजेलाल जी जब इतिहास की परत खोलते हैं तब लगता है 4-5 दिन भी कम पड़ जाना है। जाते वक़्त कहते हैं मुझसे कि ऐसे खाली मत जाइए, घर चल के चाय नास्ता कीजिए। मैंने इनका और यहाँ के मैनेजर(जो ज़्यादातर वक़्त ग़ायब ही रहते हैं) का फ़ोन नंबर ले लिया और इन्हें तसल्ली दी कि अगली बार आने से पहले फ़ोन करके आऊँगा, आप बस उस दिन चाय के लिए दूध का इंतज़ाम करके रखिएगा 😂






ये ऊपर का हाल देख ही लिए… शिक्षा का हाल ही बिहार में जब कहने लायक नहीं है तो पर्यटन के क्या ही कहने।


साथ ही में ये भी कहूँ की वर्तमान सरकार में पर्यटन मंत्री(श्री प्रमोद कुमार) हमारे शहर(मोतिहारी शहरी क्षेत्र) से ही हैं **तालियाँ**









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26 सितंबर 2020 🙂


चलो! नानी से मिल के गाँव वापस, जहाँ माँ दही जमा के इंतज़ार कर रही हैं। दही-भूजा ❤



लालबकेया नदी 😍





….जैसे गाँव मेरे ही इंतज़ार में थी कि मन्टू लौट आए तो ये मंजर पेश किया जाए 😎









कहीं दूर जब….


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27 सितंबर 2020 🙂

आज माँ को लेकर वापस मोतिहारी आ गया। कल दिल्ली के लिए रवानगी है 💃









राहुल सांस्कृत्यायन जी को जानते हैं आप ? नहीं ? वक़्त निकाल के जानिए 🙂

सांस्कृत्यायन जी कहते हैं-


“जीवन एक अनवरत यात्रा है. यात्रा मनुष्य को स्वतंत्र, ऊर्ध्वगामी उदार, तर्कशील और मानवीय बनाती है. इन आधारों पर वे किसी भी बड़े-से-बड़े विश्वास, आस्था को उत्तर-आधुनिक अर्थों में विखंडित करने का साहस रखते हैं बल्कि उसकी सीमाओं से मुक्त हो नई दिशाओं में बढ़ने का जोखिम भी उठाते हैं.”

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अब जयपुर मिलेंगे 💃
मन कर गया तो अजमेर, चितौरगढ़, उदयपुर भी


….और और और कुछ ज़्यादा ही मन कर गया तो बड़ौदा-सूरत भी 🙈





❤ 🙂

 

 

साहित्य आजतक-2018

साहित्य आजतक-18 नवम्बर 2018 🙂

‘साहित्य आजतक’ का यह तीसरा संस्करण था. 16,17,18 नवम्बर 2018. नवम्बर का महीना जो इंतजार में है दिल्ली की कड़ाके की सर्दी दिसम्बर के माथे लादने के लिए.

तो 18 नवम्बर को इतवार था इसलिए मैं इतवार के दिन ही समय निकाल पाया. 16, 17 को नहीं जा पाया.

जनपथ मेट्रो स्टेशन उतरा और गूगल मैप का भरोसा किया और चल दिया “इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स, न्यू दिल्ली” के लिए. अगले चौराहे पर रूककर मैप का बखेड़ा देख रहा था, तभी एक अंकल जी ने टोका कि अभी तो मोबाइल रख दो, रोड क्रॉस करो. मैंने उन्हें मैप बताया और अपनी दुविधा भी. वे बोले चलो मेरे साथ ये रहा सामने, मेरा ये तीसरा दिन है. अब बारी आई रोड क्रॉस करने की और अंकल जी की हालत ख़राब हो रही थी गाड़ियों को देखते हुए, जेबरा क्रासिंग होने के बावजूद. मैंने उनका हाथ पकड़ा और उस पार गएँ. मैंने उनका हाथ पकड़ा ?

खैर, अंकल जी 70 वसंत के क़रीब देख चुके थे ,अन्नू कपूर के जबरदस्त प्रशंसक थे. जल्दी में थे कि अन्नू कपूर का सेशन छूट न जाएँ.10 मिनट का रास्ता था और मेरे 17 सवाल तैयार थे.

कहाँ से हैं? क्या करते हैं आप? कवितायेँ लिखते हैं या कहानियां? किताब आई होगी कोई आपकी? रोड क्रॉस करने में हिचक क्यों रहे थे? और भी सवाल…..जो कि पूछा ही गया उन अंकल जी से उस शख्स द्वारा जो पल पल भर पहले ही गूगल मैप पर भरोसा करके चौराहे पर ठिठका हुआ था.

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहाँ कि राही मासूम रज़ा कहते थे कि जब वे लिखते थे तो केवल लेखक होते थे और पढ़ते वक़्त केवल पाठक. अंकल जी ने ये भी बताया कि आज लिखने से कईं गुना ज्यादा ज़रूरी पढना है. लिखे हुए को ही पढ़ लेना साहित्य के लिए अपना अहम योगदान देना नहीं है?

हम पहुँच गएँ और रजिस्टर किया ख़ुद को, दाहिने हाथ की कलाई पर “साहित्य आजतक” की मुहर लगी.

आज तक
इस लोगो के किनारे और पीछे भीड़ लगी थी फ़ोटो लेने वालों की, जबकि इसी वक़्त अनू कपूर जी का सेशन चल रहा था.

मुहर लगने के क्रम में अंकल जी कहीं गुम हो गए. मैं भी “लल्लनटॉप कहानी कम्पटीशन” के बारे में जानकारी लेकर ख़ुद को जल्दी से उस स्टेज के पीछे ख़ाली पड़ी कुर्सियों के हवाले किया जहां अन्नू कपूर जी इस सवाल का जवाब दे रहे थे कि दुनिया में ज्यादातर महान कार्य पुरुषों के हाथों ही क्यों हुआ है? पता है क्यों?

क्यों कि औरतें उन पुरुषों को जन्म देती हैं.

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लल्लनटॉप के स्टेज पर भी अन्नू कपूर जी आये, यहाँ उनकी कही बातों में एक ही बात याद है “चाहे किसी भी उम्र का इन्सान हो, उसे कभी सजना-संवरना नहीं छोड़ना चाहिए” कहानी भी शेयर की “टैगोर और गाँधी की जिसमें गाँधी ने टैगोर से पूछ लिया था कि ढलती उम्र में क्यूँ सजना-संवरना? टैगोर का जवाब था की ढलती उम्र में नहीं संवरा तो ये लोगों के साथ हिंसा होगी”

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इस बुकलेट पर वही बैठ के, खड़े होके, लेट के, चाहे जैसे लिखनी हो ,कहानी लिख के देना था.

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एक प्रतिभागी जिनका नाम पूछना मैं भूल गया और फ़ोटो लेते वक़्त इन्हें ये आदेश दिया कि आप कैमरे की तरफ़ मत देखिए.

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ये आदमी(?) 13:14 बजे से कहानी लिखना शुरू किया है और 16:15 बजे तक लिखा है, इस दरम्यान इसने 4 कप चाय, एक बोतल पानी और एक 40 रूपये की डेरी मिल्क चाकलेट डकार गया जो कि ये किसी और के लिए लाया था.

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तल्लीनता किसे कहते हैं, उस दिन जाना मैंने इन साहब को देखकर. इनकी कहानी भी पढ़ने की ख्वाहिश है.

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मेरी कहानी का एक भाग. कहानी का नाम- “अमृता-इमरोज़ और भाग्यश्री…वो एक लड़का भी”

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इस आर्ट्स सेंटर कभी जाना हुआ तो इस दीवार को गौर से देखना भूलियेगा नहीं, वादा कीजिए 🙂

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मैं कहीं भी रहूँ मेरे हिस्से का सूरज मुझे ढूंढ ही लेता है, इस बात का यकीन मानिए.

10
…देखना है ज़ोर कितना

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यहाँ आभार व्यक्त कर देता हूँ इस काबिल ग्रुप को उस प्ले के लिए…

5
लल्लनटॉप के मंच से कविताओं को गीतों में पिरोकर चिन्मयी त्रिपाठी और उनके हमसफ़र ने बांधा समां. कहानी लिखते हुए मुझे उठाना पड़ा था बीच से ही इन्हें देखने के लिए. शिवमंगल सिंह सुमन जी की कविता को आवाज़ दी थी इन्होंने. इन दोनों जोड़ियों से पूछा गया कि एक ही प्रोफ़ेशन में होने के क्या कान्स और प्रोस है? जवाब था “हम उब जाते हैं कभी-कभी गानों से, ऑटो वाला गाना चलाता है तब अंदर से गुस्सा आता है और उससे कहना पड़ता है कि गाना बंद कीजिए”

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रूहदारियां, रश्मि अग्रवाल, इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी मंच से इन्होंने गाया और सुनने वाले झूमे, रूह भी झूम रही थी लोगों की. काश इसका प्रमाण दे पाता मैं……

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जब दीप जले आना…जब शाम ढले आना संगीत मिलन का भूल ना जाना मेरा प्यार ना विसराना….. येशुदास जी को सुनना भूले तो नहीं हैं आप? ऐसा पाप हो गया है तो आज से ही बंद कर दो. 🙂

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मैंने गुलज़ार साहब को जीवंत किया, इन भाई साहब को ये कह कर कि आप फ़ोटो लेते रहिये जब तक मैं मना न कर दूं. ये मान भी गए और बाद में पूछा भी कि फोटोग्राफी कहाँ से सीख रहे हों? कहाँ से सीख रहा हूँ? मुझे तो पता चले पहले…..ज्यादा हो गया न ये…..

 

 

 

 

 

 

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हुसैन हैदरी, रमणीक सिंह,पुनीत शर्मा, पंकज शर्मा… इन युवा कवियों ने जो समां बाँधी है ना….इसी सेशन के समानांतर जावेद अख्तर साहब का सेशन चल रहा था. भीड़ को उसी सेशन ने अपने पास बुला लिया था पर मैंने और मेरे ‘साहित्य आजतक’ के कुछ साथियों ने इन्हें ही सुनते रहने को चुना. इनकी कविता पाठ को आप विडियो लिंक से ज़रूर सुनिए. यहां सुनिए, सुनते हुए देख भी सकते हैं इन्हें

इस कविता पाठ और ली गयी मेरी तस्वीर में एक बात है जो बतानी है मुझे. जब पंकज शर्मा अपनी नज़्म पढ़ रहे थे “मुझसे प्रीत निभाओगी क्या?” मैं तकिए के सहारे जिस अंजान प्रेमी युगल के पीछे बैठा हुआ था, पंकज शर्मा की नज़्म की एक-एक लाइन और इस प्रेमी-युगल के हाव-भाव….. और क्या कहूं अब?

नज़्म महसूस कीजिए-

जब मैं तन्हा हो जाऊंगा

गुमनामी में खो जाऊँगा

दुनिया के बंधन टूटेंगे

जब मेरे मुझसे रूठेंगे

तब मेरे दीवान से चुनकर

कोई नज़्म सुनाओगी क्या?

मुझसे मिलने आओगी क्या?

मुझसे प्रीत निभाओगी क्या?

अब आप ही बताइए कि मुझे जाना चाहिए था जावेद अख्तर जी के सेशन में? बाद में पता चला जावेद साहब के सेशन की बेबाकी भरे जवाब. वही नाम बदलना शहरों के, मुहब्बत के…. दीवानों के……अफसानों के…सरकारों के…

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कुछ बताना है इस तस्वीर के बारे में? बीते सावन में ही गाँव में लगने वाले मेले का वक़्त बीता है. इसबार दिल्ली सही 🙂

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दुसरे वाले डेरी मिल्क का क्या किया मैंने? कायदे से तो मुझे बताना नहीं चाहिए…..और बताऊंगा भी नहीं….. हाहाहा

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ये है ‘साहित्य आजतक-2018’ का हासिल क़िताबें जो बदलती हैं ज़िन्दगी….

…और भी बहुत कुछ हासिल हुआ जो लिखा नहीं जा सकता, मेरी आँखों में है वो.

अंकल जी मैथिली ठाकुर के सेशन के बाद मिले भी, मैंने उनका नंबर लिया और उनसे कहा कि “जश्न-ए-रेख्ता” में मिलेंगे ना?

“लल्लनटॉप कहानी कम्पटीशन” के एक सहभागी ‘श्रीपाल भाई’ जो कि जोधपुर से हैं और वे भी सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे हैं.उनका पिलाया गया चाय मेरे पर कर्जा हो गया है.

“लल्लनटॉप” के मंच से मेरा कविता पाठ करना और जब उद्घोषक ने मेरा नाम जाना तो कहा कि भारत में भी मंटो. उद्घोषक की आश्चर्य भरी आँखें ज़हन में देर तक टिकने वाली है.

कहानी लिखने के दरम्यान एक 80 पार कर चुकी दादी अम्मा मेरे क़रीब आयी और बोली कि बहुत देर से ये क्या लिख रहे हो? उन्हें जवाब मिला और मुझे ये तारीफ़ कि लिखावट कितनी अच्छी है.

अंकल जी से सबक मिला कि लिखने से ज्यादा ज़रूरी पढना है.

अंजान-प्रेमी युगल के हाव-भाव ने वो सीखाया जो मैं किसी प्रेम-ग्रन्थ को भी अगर घोल के पी जाऊं तो शक ही रहेगा कि क्या हासिल हुआ.

अंत में लौटते वक़्त मैंने अपना विस्तार पाया…उन चंद लम्हों पहले की छूटी हुई नज़ारों,सबक और अनगिनत चीज़ों में…..

आख़िरी बात-

14-16 दिसम्बर 2018 को मिले रहे हैं ना हम…अगली कहानी का हिस्सा बनने के लिए.

मिलना कहाँ है? अरे….वहीं…. जश्न-ए-रेख्ता के पांचवें संस्करण में, मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम, न्यू दिल्ली में…इत्ता आसां तो है.

🙂

शुरुआत :)

एक नयी शुरुआत है मेरे उन पलों से रूबरू होने के लिए जो पीछे छूट चुकी हैं या छूट रही हैं. उन पलों की जरुरत है फ्यूल के जैसे मेरी ज़िन्दगी की गाड़ी के लिए, जब गाड़ी किसी राह पर चलने से मना कर दे, रूठ जाए मुझसे ही या मुझे सजा दे मेरे किए पर…तब इन्हीं पलों के आगे झुकता हूँ और ये मुझे आगे धकेल देती हैं एक हद तक.

आप उन पलों से क्या हासिल करेंगे यह तो आपके ऊपर है पर यहाँ जो वक़्त आप जाया करेंगे उसकी भरपाई आपके चेहरे की कुछ मीटर की मुस्कुराहट करेगी ! इतना यकीन तो मैं दिला ही सकता हूँ 🙂

wazirabaad

🙂