पिछला 4 दिन कैसे निकले हैं, ब्लॉग पोस्ट (लिंक) देखा होगा तो जान ही गएँ होंगे। मुझे और छोटे भाई को छोड़ सबको फ़िक्र होने लगी थी कि मन्टू इत्ता घूम रहा है, बारिश में भीग रहा है, तबियत ख़राब न कर लेना, खाना ठीक से खा रहा है ना ? अपना ध्यान रख रहा है ना ? मैं यहीं कहता हूँ सबसे(माँ, पापा, बहनें, नानी) कि मैं ये इत्ता पहली बार नहीं घूम रहा, जाओ देखो मेरे फ़ोटो ब्लॉग के पिछले पोस्ट.. हाहाहा 😎
और जब आपको, जिस पल लगता है कि कोई आपकी फ़िक्र कर रहा है तब अपने अंदर भी फ़िक्र शुरू हो जाती है कि सच में तबियत न ख़राब हो जाए पर वहीं है ना आप मन से कुछ भी कीजिए कभी भी, कभी भी नहीं थक सकते ना ही उस काम से ऊब होगी कभी।

माँ ❤
माँ इस बार भावुक नहीं हुईं।

स्नेहा, सोनी का तय है हर बार रोना ही है मेरे आते वक़्त। इसबार मैंने एक प्लान बनाया, सुबह उठते ही सोनी, स्नेहा पर बहाने खोज खोज नाराज़ होने लगा ताकि जाते वक़्त इनको लगे कि भईया ज़्यादा अच्छे नहीं हैं। पर ये ट्रिक स्नेहा पर काम किया, वो नहीं रोई पर सोनी का पूछिए ही मत 😂
दिल्ली के लिए रिज़र्वेशन कराते वक़्त पापा ने कहा था कि फ्लाइट से चला जा, मैंने ही मना कर दिया कि नहीं ट्रेन ही ठीक है और मन में सोचा कि पहली बार फ्लाइट में सफ़र करूँगा तो किसी यादगार जगह जाऊँगा, फ्लाइट से दिल्ली क्या जाना। पर बाद में बात पापा की ही रही, ट्रेन टिकट कैंसिल कराना पड़ा और फ्लाइट की बुकिंग हो गई।
बस से पटना के लिए सुबह 10 बजे सफ़र शुरू…

मुजफ्फरपुर 😍 13 बजे के क़रीब
पटना क़रीब 15:30 बजे तक पहुँच गया
महात्मा गाँधी सेतु 🙂






कंकड़बाग 🙂
बुकिंग के वक़्त ही सीट चुनने का ऑप्शन रहता है पर उसके लिए एक्स्ट्रा पे करना पड़ता है। नवीन जी ने बताया कि बोर्डिंग पास लेते वक्त हम अगर रोने लगे कि भईया, ज़िन्दगी की पहली फ्लाइट है, खिड़की वाली सीट कर दो, तो भईया पिघल जाते हैं। मैंने भी यहीं किया पर विंडो सीट अवेलेबल न होने की वज़ह से भईया पिघल तो गए पर विंडो सीट न मिल पाई फ़िर भी भईया के पिघलने से इतना फ़ायदा हुआ कि बीच वाली सीट मिल गई, और बीच वाली सीट मिलने का दूसरा फ़ायदा ये हुआ कि नियम के मुताबिक़ मुझे PPE किट मिल गया 💃 🙈



सारे तामझाम(सिक्योरिटी चेकिंग, एक्स्ट्रा लगेज स्कैनिंग, चार-पाँच जगह cctv कैमरा से गुज़रना, पर्स, घड़ी, बेल्ट को निकाल के बैग में रखना, लैपटॉप को ट्रे में रखना) करके बोर्डिंग गेट तक पहुँचे। वहाँ सेलफ़ोन चार्ज पर लगाया और माँ ने खाने को जो पराठा-छोले-आचार दिए थे तो खा लिये। तब चाय की तलब उठने लगी, असलियत पता होने के बावजूद दाम पूछने गया। 160₹ की चाय फ़िर लगे हाथ कॉफी पर कूद गएँ तो कॉफ़ी निकली 180₹ की.. वाह ! फ़िर तलब पता नहीं कहाँ ग़ायब हुई, समझ ही नहीं आया। मतलब यूँ समझिए कि 2 सेकंड के लिए ‘चाय’ लफ़्ज़ से नफ़रत टाइप 😂





चाँद भी गवाही दे रहा 💃

फ्लाइट में पहुँच गए, फ्लाइट अटेंडेंट का good evening दिल में उतार लिये। सीट तक पहुँचे और देखा तो सामने ही आपातकालीन दरवाज़ा। अब खुराफ़ाती दिमाग सोचने लगा कि सही है, कुछ पंगा हुआ तो मन्टू सबसे पहले कूदेगा.. वाह 🙈
ये सोच ही रहा था कि एक फ्लाइट अटेंडेंट ने ढेर सारा इंस्ट्रक्शन हिंदी/इंग्लिश में आपातकालीन दरवाज़ा पर देने लगीं। हिंदी वाले इंस्ट्रक्शन को ध्यान से सुना और अँग्रेजी वाले इंस्ट्रक्शन पर केवल उन्हें देखा 🙈🙈

मेरी उत्सुकता देखकर नवजात बच्चा भी कह देता कि ये देख लो दुनिया वालों, ये मन्टू की पहली फ्लाइट जर्नी है। वो तो शुक्र मनाइए कि करोना के चक्कर में मास्क की वज़ह से आधी फीलिंग्स छुप जा रही है लोगों कीं, फ़िर भी आँखें सबकुक ढोल पिट के बता ही देतीं हैं। मेरी आँखें भी पीछे कहाँ रहने वाली थीं।



पास मेरे जो भईया थे जिन्हें विंडो सीट मिली थी, एकदम नीरस आदमी। इत्ता नीरस कि जैसे वो रोज़ ही फ्लाइट से ही सब्जी लेने जाते हों, खेलने जाते हो, फ्लाइट से ही बच्चों को स्कूल छोड़ते हैं, परनानी को डॉ के लेके हमेशा फ्लाइट से ही जाते हो, कोई उत्सुकता ही नहीं। फ़िर भी वो तो मैंने ऐसे ऐसे सवाल पूछे कि उन्हें थोड़ा खुलना पड़ा और बोलने लगे। पर उनका बोलना मेरे लिए आगे दुःख की बात साबित हुई। दुःख की बात ? आगे बताता हूँ क्या थी दुःख की बात…
टेक ऑफ़ को महसूस करना, अपने वेट को कम होते महसूस करना जैसे झूले से उतरते चढ़ते हैं। फ्लाइट जब अपने मैक्सिमम एल्टीट्यूड पर आ गई तब मुझे फ़रहान अख़्तर(भाग मिल्खा भाग) याद आ गए जब वो फ्लाइट से विदेश जा रहे होते और एक एल्टीट्यूड पर डरकर कहने लगते हैं कि “ये बहुत ऊपर ले आया, ये ठोकेगा, बहुत ऊपर ले आया।”


अब दुःख की बात। फ्लाइट के ऊपर आ जाने के बाद और अँधेरा हो जाने के बावजूद मुझे सबकुक क्लियर दिख रहा था नीचे, जैसे गंगा नदी, खाली मैदान, धान के खेत, आम-लीची के बागान। आपको लगेगा कि अँधेरे में कैसे दिख रहा था। पर आप मानो कि ऐसा पावर है अपुन के पास, अँधेरे में देख लेते हैं 😎
पर जब पास वाले भईया को पता चला कि मेरी पहली फ्लाइट जर्नी है तो कहते हैं – “पहली थी तो दिन वाले टाइमिंग में बुक करते न, सबकुक दिखता नीचे का” इत्ता कह के वो चुप हो गए और उनके ये कहने के बाद ही मुझे नीचे का सबकुछ दिखना बंद हो गया। मैं भी बाकियों के जैसे मोबाइल निकाल के ये ब्लॉग पोस्ट लिखने लगा 😂
आ गए दिल्ली 20:40 के क़रीब





लैंडिंग में होने वाली उथल पुथल से घबराया जा सकता है, पर मैं नहीं घबराया, क्योंकि हाई एल्टीट्यूड पर फ़रहान घुसा था मेरे अंदर और वहाँ बच गए थे तो ये तो जमीन पर हैं अब। और ऊपर से आपातकालीन दरवाज़े के सामने ही 😂😂
दिल्ली मेट्रो की बात अब, करोना से बचने के लिए केजरीवाल सरकार की तैयारी हर तरीके से संतोषजनक लगी। माँ को अब यक़ीन दिलाना आसान रहेगा कि देखो मैं ठीक हूँ यहाँ 🙂


इस पोस्ट का मेजर पोर्शन हवा में रहते हुए ही लिख लिया था, ये मेट्रो वाली बात मेट्रो में अपनी आख़िरी मंज़िल(मुख़र्जी नगर) की तरफ़ बढ़ते हुए। शेयर इसे रूम पर आके कर रहा हूँ।
रूम 😭😭😭😭
15 दिन पहले बहन(सोनी) अपना सामान लेने आई थी तो रूम को रहने लायक बना के गई थी पर अभी भी मेरे बहुत पसीने निकलने वाले हैं। ख़ैर, गानों और चाय का साथ हो तो क्या कुछ नहीं किया जा सकता है। 4 अक्टूबर को प्री भी क्लियर किया जा सकता है… नहीं ??? नहीं किया जा सकता क्या ? कोई ना, 2021 वाला अपने हाथ में है 💃
रूम पर आया, आलू-प्याज़ के परांठे बाहर से पैक करा लिया। चायपत्ती पड़ी थी, चीनी और दूध ले आया, चाय ख़ुद से बनाकर भर पेट खा लिया.. कल की कल देखेंगे अब 💃

दिल्ली दिल्ली दिल्ली दिल्ली 💙💙💙💙💙
🙂






























































































































