20-21 मार्च 2019 🙂
प्रतीक भाई ने जनवरी में ही कहा था, इस बार होली पर मथुरा चलेंगे, मैंने कहा था मेरा जोधपुर जाने का रहेगा तो कम ही उम्मीद है।पर होली आ गयी और हमदोनों चले गए मथुरा। रोहित, शनि, गोविंद, नितिन, उत्कर्ष इन सबसे कहा था चलने को।होली के नज़दीक आते-आते सबके घर वाले उन्हें घर बुलाने लगे नहीं तो पक्का चलते वो। और तो और सबके इसबार घर जाना जाना बहुत ज़रूरी हो गया था 😂
ख़ैर, तो प्रतीक भाई और मैं, चल पड़े

वज़ीराबाद 🙂
20 मार्च को मौसम ठीक नहीं लग रहा था,तेज़ हवा के साथ बादल और सूरज की लुक्का-छीपी दिन भर चलती रही।

हज़रत निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर ट्रेन खुलने के इंतज़ार में, ये प्यासा साथी मिला 🙂

हवाएँ, ले जाएँ जाने कहाँ हवाएँ

दिल्ली से बाहर निकलते ही गेंहू से अटे पड़े खेत गाँव की याद दिलाते।


मथुरा 🙂


मथुरा की चाय और समोसे



प्रतीक भाई













हम सोच के चले थे कि मथुरा में ही रुकेंगे।अगले दिन वृंदावन चलेंगे फ़िर एक ट्रैफिक पुलिस वाले अंकल जी मिले चौराहे पर चालान काटते हुए। हम उनके फ़्री हो जाने का इंतज़ार कर रहे थे पर वो समझ गए कि हम कुछ पूछने के लिए खड़े हैं। चालान काटना छोड़ हमसे पूछा, क्या ? हमने कहा कि कहाँ रुके मथुरा कि वृंदावन ? कहते हैं वृंदावन निकल जाओ, वहाँ रुकने की भी दिक्कत नहीं होगी, ख़ूब धर्मशाला है।
तब हम वृंदावन के लिए निकल लिए जो कि मथुरा से 14 किलोमीटर है बस।






पूर्णमासी की चाँद 😍



रंग जी मंदिर, वृंदावन



पुराना गोविंद मंदिर

वृंदावन की गलियां


आज तक की सबसे शानदार चाय 😍
अंकल जी से मैंने पूछ लिया कैसे बनाया, क्या-क्या डाला। कहते हैं पानी एक बूंद नहीं।ख़ाली दूध की चाय और दूध भी पैकेट वाला नहीं।
गोविंद घेरा, वृंदावन की होलिका दहन-







बहुत सही, डफली ना सही, प्लेट-छोलनी सही




नया बस स्टैंड की होलिका दहन

पुराना गोविंद मंदिर

होली की सुबह 🙂

रंग जी मंदिर



मेरो तो गिरधर गोपाल दुसरो ना कोई




इस मन्दिर में विधवा महिलाएँ होली खेलती हैं
【इस तस्वीर को ध्यान से देखना】

जमुना जी ओर जाते हुए



















परिक्रमा मार्ग पर चलते हुए होली का आनंद








बहुत सही बहुत सही
















जूली 😍





सुबह वाली होली ख़त्म





कुल्हड़ में डालो भाई कप में दिल्ली पियेंगे




😂









श्री बाँके बिहारी लाल 🙏





दोपहर वाली होली ख़त्म














प्रिया कांत जू मंदिर-








नई दिल्ली

मथुरा के पेड़े
वृन्दावन की होली देखते-खेलते हुए बचपन की गाँव की होली याद हो आयी और यह मलाल जाता रहा।
‘ढप धरि दे यार, गई पर की’
और
गयौ मस्त महीना फागुन कौ, अब जीवै सो खेलै होरी-फाग’
मतलब अपनी ढफली और साज़ रख दो और अगले साल का इंतज़ार करो।फागुन का मस्त महीना तो अब ख़त्म हो गया, अब जो जीएगा, वही अगली होली खेलेगा।
अब कहाँ मिलेंगे ? पता नहीं !
🙂