AIFACS ~ अखिल भारतीय ललित कला और शिल्प सोसायटी

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The Andrei Stenin International Press Photo Contest Exhibition-2019
22 फरवरी-28 फरवरी 2019 🙂

और…
A exhibition by Gauri Shanker Soni.
23 फरवरी-28 फरवरी 2019 🙂

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मामा जी SSC की तैयारी कर रहे थे, उन्होंने कहा The Indian Express नहीं The Hindu अख़बार पढ़ना चाहिए,मैंने कहा था ठीक है the hindu मंगा लेंगे।पिछले दिनों मामा जी की कोचिंग पूरी हो गई, वो गाँव चले गए तो मैंने वापस से The Indian Express लगवा लिया।
…और अगले ही दिन ये ख़बर मुझे इस अख़बार में-

…फ़िर सोचना क्या था, प्रतीक भाई को बोले और वो तो जैसे तैयार ही बैठे हो। मैं उन्हें कहूँ कि चलोगे मेरे साथ नरक, तो एक बार तो मना नहीं ही करेंगे। हाँ, घर वाले उनके कहेंगे कि अबे वो मन्टू पागल तुझे नरक में लेके जा रहा है तब कुछ और फ़ैसला ले सकते हैं हमारे प्रतीक भाई!
…तो झोला उठा के हमलोग पहुँच गए केंद्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन और पता नहीं इस दुकान तक कैसे पहुँच गए, पहुँच गए तो पहुँच गए। पहली बार सच में अनुभव हुआ कि चाय में चुम्बकत्व का गुण भी पाया जाता है। 😂


केंद्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 1 से बाहर निकलिए तो गिन के आप 17 कदम चलेंगे और ख़ुद को पाएँगे ”अखिल भारतीय ललित कला और शिल्प सोसायटी” यानी AIFACS के अंदर।

और कुछ ऐसा मिलेगा पढ़ने को, समझने को, आत्मसात करने को 🙂


…इतना सन्नाटा क्यों है भाई !

‘बांग्लादेश’
सहारे हम कहाँ ढूँढे, कौन है जिसे ज़रूरत है हमारी ?

‘बांग्लादेश’
मुझे घर की तलाश ज़रूर है,मगर ये भी पता है कि कोई घर नहीं है।

‘यमन’
इस तरह सच मानिए
डर की स्थिति में मैंने सिर्फ़ ‘हाँ’ कहा
और कुछ नहीं, सच मानिए।

‘केन्या’
मनुष्य जब सिर्फ़ वही होता है जो वो दिखाई देता है तो वह लगभग कुछ नहीं होता है।

‘केन्या’
सेलफ़ोन को छोड़ के बाकी सबकुक उस दिन मैंने खो दिया जो मेरा था।

‘केन्या’
उनके साथ जुड़कर तुम्हें पता चल जाएगा कि वह क्या दूरी है जो तुम्हें उनसे अलग करती है।

‘ईरान’
मेरा अपना चाँद जिसे मैं बल्ब की तरह जब चाहे जला बुझा सकूँ। रात जितने बड़े कमरे और ख़ामोशी के सूरज से इस्तीफ़ा माँग लूँ।

‘ईरान’
ज़िन्दगी ट्रेन है, बहुत देर तक नाउम्मीदी के प्लेटफार्म पर नहीं रुकती।

‘ईरान’
यह एक निरंतर चलने वाला सपना है।

‘भारत’ 【अजय कुमार, ये तस्वीर तीसरे स्थान पर आई है】
जीवन का मृत्यु की तरफ़ जाना ही बीतना है समय का।

‘भारत’ 【अमित मौलिक, ये तस्वीर भी तीसरे स्थान पर आई है】
किस तरह गुत्थमगुत्था हो गयीं थीं साँसे
फ़िर लहरें
फ़िर आग
फ़िर लपटें
फ़िर उसकी चिंगारियाँ
फ़िर धुआँ-धुआँ…

‘इराक़’
“गीता पढ़ने की बजाय हम फुटबॉल खेलकर स्वर्ग के नज़दीक पहुँच सकते हैं” किसने कहा ?
विवेकानंद ने कभी कहा था अपने शिष्य को-जिनके पास उड़ने के लिए पँख है उन्हें पैरों की क्या ज़रूरत।

‘रूस’
यह उन दिनों की बात है जब ऐसा लगता कि श्रम की ताक़तों को आसानी से हराया नहीं जा सकता।

‘केन्या’
कुछ ही लोग【लड़कियाँ】 शून्य तक पहुँचते हैं क्योंकि यहाँ तक की यात्रा लम्बी है।

‘केन्या’
हाँ, मैं कुछ होने की कोशिश करूँगा, कोशिश न करने का सीधा मतलब है अहंकारी होना।

‘फ्रांस’
पूरी रोशनी में हम छाया तक नहीं।

औरतों तुम रोया नहीं करो
तुम इतना गाया करो
कि रोना आए ही नहीं कभी ~ विष्णु नागर

‘फ़्रांस’ 【अपने नडाल भईया हैं 😂🙈】
केवल घाव ही अपनी भाषा में बात करता है।

‘अफ़्रीका का कोई देश’
…चींटियों का अनुशासन तुमने ख़ूब देखे होंगे

‘इटली’
कुछ वास्तुविद कहते हैं पुरानी इमारतों की अब मरम्मत नहीं हो सकती। सच ही कहते होंगे।

‘इटली’
कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना,नज़रें मिलाना, नज़रें चुराना

‘इटली’
कुछ चीजें इस तरह अपनी बन जाती हैं कि हम उन्हें भूल जाते हैं।

‘इटली’
जहाँ सभी विलाप कर रहे हो, वहाँ रुदन कोई नहीं सुनता।

‘साउथ अफ़्रीका’
मनुष्य की त्रासदी तब और बढ़ जाती है जब वह हिम्मत हार जाता है।

‘साउथ अफ़्रीका’
पर्वत के पास है एक भारी विचार जो उसे हिलने नहीं देता।

‘साउथ अफ़्रीका’
जो चले गए हैं दूर
इंतज़ार है उनकी वापसी का

‘रूस’
…मगर सुबह की उम्मीद की सबसे बड़ी वज़ह रात है।

‘रूस’
हर खिलौने को टूटने का अधिकार है।

‘रूस’
तुम उदास हो क्योंकि उन्होंने तुम्हें छोड़ दिया और तुम गिरे नहीं हो।

‘रूस’
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‘तुर्की’
दिल ढूँढता है….

‘बेलारूस’
Cranberry 😍

‘रूस’
साँझ उतरेगी अकेली झील पर…

‘ईरान’
बिना बताए किसी को भी, एक पतंग मैंने भी उड़ाई थी आसमां पर कभी बचपन में

अंधा व्यक्ति अपने कंधे पर सितारा रखता है।

मुक्तिबोध ने अपनी एक कविता में लिखा था कि इस दुनिया में लोग चलते दिखाई दे रहे हैं, किंतु कोई कहीं नहीं जा रहा है।

“मैं एक मनुष्य हूँ तो फ़िर कैसे जा सकता हूँ मनुष्यता के ख़िलाफ़”

जिन बच्चों को कोई हाथ पकड़कर नहीं चलाता वे बच्चे जानते हैं कि वे बच्चे हैं।

जहाँ जीवन की न्यूनतम ज़रूरतें
बहुत ही न्यूनतम हो
इस तरह कितने दिन जीवित रहेगा
यह परिवार ~ निशांत

जब तक हम यह सोचते हैं कि हमारा कोई मोल है, हम अपने साथ ग़लत करते हैं।

हर चीज निस्सार है लेकिन बाद में, हर चीज की पीड़ा सह लेने के बाद।

”ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है, हम में से कोई ज़िन्दा नहीं रहेगा, फ़ूल कहता है, चींटी कहती है, जिनके घर हमसे बड़े हैं।”

अक़्सर हमें अपने होने का भय दर्पण तक पहुँचा देता है।

‘कारवाँ’ को हेल्लो कहिए

फूल अगर बेमौसम खिलने लगें तो उन्हें मत उगने दो।

पुराना वक़्त
बरगद के पेड़ की
थकी शाखाओं से
जड़ों की ओर लटका हुआ है।

किधर ?

इधर 🙂

मज़ा आ गया भीडू 😂😂😂

तुम पर किसी का कोई कर्ज़ नहीं है, अगर तुम सूरज को उसकी रोशनी वापिस कर सकते हो।
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अब गौरी शंकर सोनी जी की दुनिया से रूबरू होते हैं-














…मेरी आवाज़ सुनो !




इसे देख ख़लील जिब्रान याद आये



इस तस्वीर को मैंने अपने मनी प्लांट को दिखाई और कहा-सीख इससे कुछ


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…कुछ और







बस अब हो गया 😂😂😂
ग़ैरज़रूरी बात-
~ कहीं पढ़ा था कि इंसान को इतना दरियादिल होना चाहिए कि उसके तमाम दोस्त अपने कुत्तों को उस इंसान के सहारे छोड़कर टहलने जा सकें।
~ मेरे अंदर के ‘मैं’ और बाहर के ‘मैं’ में सुलह हो गई तो शिवरात्रि पर ऋषिकेश मिलेंगे।
~ कभी-कभी सोचता हूँ मुझे दुबारा कुछ नहीं चाहिए, माँ भी नहीं।
…ख़ैर 🙂
【तस्वीर के लिए इस्तमाल की गई ज़्यादातर पँक्तियाँ स्पेनिश कवि अंतोनियो पोर्चीया की हैं】

































































