जो वादे कर लिये जाते और पूरे नहीं होते तो दिल किसका दुखता है, वादा करने वाले/वादा के लिए इंतज़ार में बैठने वाले का या वादा नहीं निभाने वाले का?
ख़ैर, मैंने वादा किया था गुजरात मिलेंगे हम, वर्ल्ड बुक फेयर 【5-13 जनवरी 2019】से पहले।
गुजरते साल और नए साल पर पहले हिमाचल के एक पहाड़ी गाँव जाना तय हुआ था, पर केंसिल हो गया क्योंकि मुझे जाना था रण ऑफ कच्छ 🙂
कोचिंग वालों का एक महीने पहले ही अगले एक महीने का टाइम टेबल आ जाता है【दृष्टि-the vision, इनका मैनेजमेंट वाक़ई काबिलेतारीफ़ है】टाइम टेबल से पता चला गया कि 31 dec और 1 jan को ऑफ रहेगा, 2 दिन मैं छुट्टी लेता और रण ऑफ कच्छ जाता। 30 dec को भी कोचिंग ऑफ करना पड़ा दिल्ली प्रशासन का आर्डर आ गया था। नए साल की भीड़ को कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है सरकार के लिए तो उन जगहों पर छुट्टी घोषित की गई इस बार जो भीड़ भाड़ वाले इलाके हैं दिल्ली में। सही हुआ, 2 दिन की छुट्टी जो मैं ले रहा था अब एक दिन(2 jan) की ही होगी।वो भी तकनीक इतनी आगे है कि मैं दूर होते हुए भी क्लास में ही प्रेजेंट रहूँगा 🙂
तो शुरू करें सफ़र… चलो…

🙂

पुरानी दिल्ली स्टेशन के लिए रिक्सा लिया। पता नहीं मुझे क्यों रिक्सा पर चढ़ना पसंद नहीं पर मजबूरी में चढ़ना पड़ता है कभी कभी। आख़िरी में जितना भी किराया बैठता है उसमें मैं 10₹ जोड़ के देता हूँ।

ये तस्वीर ले रहा था तो सिक्योरिटी गार्ड(परिमल जी,बागपत से) कहते हैं रेल नहीं देखी पहले ? मैं कहता हूँ ब्लॉग जानते हैं आप ?वो कहते हैं नहीं मैं कहता हूँ मैं भी पहली बार देख रहा हूँ रेल, दोनों हँसते हैं और फ़िर वो कहते हैं क्या करते हो ? मैंने कहा घूम घूम के फ़ोटो लेता हूँ,पढ़ भी लेता हूँ 🙂

छुक छुक छुक छुक रेलगाड़ी

स्टेशन पर जाते ही मेरे कदम इस ओर बढ़ने लगते हैं,यक़ीन मानो इस बात का

टोमैटो सूप और नया भारत 🙂

गुड़गाँव से बाहर निकलते ही ऐसा नज़ारा आम हो गया। एक ‘दोस्त’ ने बताया कि पूरे रेलवे ट्रैक के किनारे ऐसा दिखना ही है इस मौसम में, ये बात मुझे बाद में ध्यान आया।

अलवर और जयपुर के बीच


स्टेशन का नाम-चिरई
भोजपुरी में पक्षी को चिरई कहा जाता है।
लोग बाग धूप सेंक रहे हैं,पीछे कोई ज़हर उगल रहा है।

भुज रेलवे स्टेशन पर उतर कर सूरज से आँख मिलाते हुए।

🙂

चाय के कप हाथों में
स्वेता दी, जिनकी सूझ बूझ से मुझे 31 dec को ही रण ऑफ कच्छ जाने का मौका मिला और अहमदाबाद घूमने के लिए 1 दिन एक्सट्रा।



लो सफ़र शुरू हो गया।

छोटू मैग्नेटिक फील्ड



🙂

ये गोविन्द भाई, 50₹ में किराए पर दूरबीन देते हैं आप जितनी बार मना करेंगे उतनी बार 10-10₹ कम करते करते 10₹ में दूरबीन दे देंगे।

भुट्टा नहीं व्हाइट रण देखो

देवाराम जी 🙂
ये अपने दादा और पिता जी से गाना-बजाना सीखा है, जैस तस्वीर में इनका पोता है, वो भी सीख जाएगा।

मिलिए, ताज़ अली से(मुश्किल से नाम बताया अपना) मैंने इन जनाब की फ़ोटो लेनी चाही तो मुँह छूपा लिया जैसे कि इनके पिता जी ने मुझे भेजा हो कि देख आओ मेरा बेटा चाय बेच रहा है या मोबाइल में घुसा हुआ है।

ब्लैक हिल पर अपनी हाज़िरी लगवाते हुए

…वाक़ई, जैसा सोचा होगा वैसे फ़ोटो आयी नहीं है।

रब जी से मिलिए, 10₹ में साफ़ा के लिए रंगीन कपड़ों का भंडार है इनके पास। सभी जन फ़ोटो खिंचाने के लिए ही लेते हैं फ़िर वापस कर देते हैं।

ख़फा है कोई दुनिया से…

असदुल्लाह भाई से मिलिए, मैंने पूछा इनसे ठंड में लोग सोडा पीते है ? ख़ाली बैठे थे, ज़वाब देते हैं “तभी तो बैठा हूँ यहाँ” मैं आगे निकल गया फ़ोटो लेने के लिए

गन्ने का जूस,
*इन भईया का नाम पूछना ही भूल गया।

दिल्ली चलोगे ?

काँधे तक आया है मेरे ये

माइक हाथ में लिये ‘तुम तो ठहरे परदेशी’ मदन जी गा रहे हैं, दाद देने वाले दोनों उस्तादों का नाम अल्ताफ़ और अज़ताब है।
ये माइक शानदार लगी। इसी में स्पीकर है, चार्ज हो जाती है, पेन ड्राइव लग जाता है। बस ऑन करके गाना गाइए और आस पास वालों को सुनाइए।
मदन जी मेरे पूछे सवाल पर कहते हैं “हाँ,500 ₹ का है, दिल्ली में मिल जाएगा।”

स्वीट कॉर्न

दूरबीन वाले एक और गोविंद जी से मिलिए-एक दिलचस्प वाकया बताऊँ, मैंने 3 दूरबीन वाले लड़कों से उनके नाम पूछे, तीनों ने ही अपना नाम ‘गोविंद’ बताया। जब स्वीट कॉर्न खा रहा था तब ये गोविंद भी दूर दिखा। इशारे से मैंने इसे दूरबीन ऊपर उठाने को कहा और पास बुलाके पूछा अपना असली नाम बताओ। “फ़ारूख़” तब समझ आया कि ड्राइवर भईया कच्छ को मिनी पाकिस्तान क्यों कह रहे थे कार में। फ़ारूख़ कहता है पैसे दो फ़ोटो लिये हो। मैंने कहा पढ़ते हो? फ़ारूख़ कहता है हाँ,सातवीं में,मैंने कहा 7 का पहाड़ा सुनाओ, और फ़ारूख़ का झूठ पकड़ा गया। फ़ारूख़ सलमान ख़ान का फैन निकला, इसे “हैंगओवर” गाना पसंद है। मुझसे कहता है भाई कार शेयर करके आये हो कार तक जल्दी पहुँच जाना नहीं तो वो छोड़ के भाग जायेंगे आपको।मैं कहता हूँ “अभी छोटे हो पढ़ाई करो और दुनिया पर विश्वास भी“

विजय भईया(ड्राइवर) वहाँ के सभी दुकान पर जाके ख़ुद ही काम करते हैं। कॉफ़ी मस्त बनाई थी इन्होंने।

आख़िरी डूबते सूरज को देखने के लिए व्हाइट रण जाते है।



नमक के रेगिस्तान में पानी और एक प्यासा भी।

रण उत्सव


सूरज कितना अकड़ रहा है या कोई और ?



2018 दुखदायी था या 2019 होने वाला है इनके लिए?









अहमदाबाद, साबरमती नदी
अज़मेर के बाद ये शहर सही लगा।






अमर भईया, नेपाल के लुम्बिनी से है। इंडिया के लगभग सभी शहरों में रह के काम किया है इन्होंने।
अगली बार बिहार जाना हुआ तो इनके पहाड़ी गाँव जाना तय है 🙂





चंपारण
गाँधी जी की कर्मभूमि है चंपारण(मोतिहारी)

तोते के इस जोड़े का ठिकाना देखिए



संजना,रोशनी,पूजाराम 🙂


आश्रम के बच्चे छुट्टियाँ मना रहे हैं।



नाम कुछ भी हो, मज़ा आ गया खाके इसे।
दुकानदार अंकल से मैं जाते ही बोला, समोसा-कचौरी है। वो गुजराती में बोलते हैं और मुझे लिस्ट की तरफ़ इशारा करते हैं, मैं उन्हें बिहार की तरफ़ इशारा करता हूँ। तब जाके वो अपनी मर्जी से ये आर्डर किया मेरे लिए।

कांकरिया लेक,अहमदाबाद




Zorbing Balll–पहली बार देखा, जाना….

….और कर भी लिया










भावनगर के किसी स्कूल के नेकदिल बच्चे 🙂

मेला ख़त्म


अब्दुल्ला भाई से मिलिए,अहमदाबाद से हैं।देवबंद यूनिवर्सिटी में अपनी धार्मिक क़िताबों को अँग्रेजी में अनुवाद करते हैं और आगे ग्रेजुएशन करना कहते हैं।अहमदाबाद में NGO भी चलाते हैं साथ में बिजनेस भी करते हैं dealing with all type of scrap. 🙂
शुक्रिया 🙂
ट्वीटर की दोस्त हैं ‘महुआ’ कहती हैं-
यादों से तारीख़ बनती है न
याद बनाइये,तारीख और दिन
यादगार बन जायेगा…:)
सफ़र शानदार रहा, दुनिया पर विश्वास करने की मेरी ख़ूबी/कमी के और क़रीब पहुँच गया। कुछ ऐसे लोग मिले जो जीवन भर मेरा हाथ न छोड़ेंगे 🙂
तो अब वर्ल्ड बुक फेयर में मिलते हैं।
शायद, उसके लिए ब्लॉग न लिख पाऊं 🙂