साहित्य आजतक-2018

साहित्य आजतक-18 नवम्बर 2018 🙂

‘साहित्य आजतक’ का यह तीसरा संस्करण था. 16,17,18 नवम्बर 2018. नवम्बर का महीना जो इंतजार में है दिल्ली की कड़ाके की सर्दी दिसम्बर के माथे लादने के लिए.

तो 18 नवम्बर को इतवार था इसलिए मैं इतवार के दिन ही समय निकाल पाया. 16, 17 को नहीं जा पाया.

जनपथ मेट्रो स्टेशन उतरा और गूगल मैप का भरोसा किया और चल दिया “इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स, न्यू दिल्ली” के लिए. अगले चौराहे पर रूककर मैप का बखेड़ा देख रहा था, तभी एक अंकल जी ने टोका कि अभी तो मोबाइल रख दो, रोड क्रॉस करो. मैंने उन्हें मैप बताया और अपनी दुविधा भी. वे बोले चलो मेरे साथ ये रहा सामने, मेरा ये तीसरा दिन है. अब बारी आई रोड क्रॉस करने की और अंकल जी की हालत ख़राब हो रही थी गाड़ियों को देखते हुए, जेबरा क्रासिंग होने के बावजूद. मैंने उनका हाथ पकड़ा और उस पार गएँ. मैंने उनका हाथ पकड़ा ?

खैर, अंकल जी 70 वसंत के क़रीब देख चुके थे ,अन्नू कपूर के जबरदस्त प्रशंसक थे. जल्दी में थे कि अन्नू कपूर का सेशन छूट न जाएँ.10 मिनट का रास्ता था और मेरे 17 सवाल तैयार थे.

कहाँ से हैं? क्या करते हैं आप? कवितायेँ लिखते हैं या कहानियां? किताब आई होगी कोई आपकी? रोड क्रॉस करने में हिचक क्यों रहे थे? और भी सवाल…..जो कि पूछा ही गया उन अंकल जी से उस शख्स द्वारा जो पल पल भर पहले ही गूगल मैप पर भरोसा करके चौराहे पर ठिठका हुआ था.

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहाँ कि राही मासूम रज़ा कहते थे कि जब वे लिखते थे तो केवल लेखक होते थे और पढ़ते वक़्त केवल पाठक. अंकल जी ने ये भी बताया कि आज लिखने से कईं गुना ज्यादा ज़रूरी पढना है. लिखे हुए को ही पढ़ लेना साहित्य के लिए अपना अहम योगदान देना नहीं है?

हम पहुँच गएँ और रजिस्टर किया ख़ुद को, दाहिने हाथ की कलाई पर “साहित्य आजतक” की मुहर लगी.

आज तक
इस लोगो के किनारे और पीछे भीड़ लगी थी फ़ोटो लेने वालों की, जबकि इसी वक़्त अनू कपूर जी का सेशन चल रहा था.

मुहर लगने के क्रम में अंकल जी कहीं गुम हो गए. मैं भी “लल्लनटॉप कहानी कम्पटीशन” के बारे में जानकारी लेकर ख़ुद को जल्दी से उस स्टेज के पीछे ख़ाली पड़ी कुर्सियों के हवाले किया जहां अन्नू कपूर जी इस सवाल का जवाब दे रहे थे कि दुनिया में ज्यादातर महान कार्य पुरुषों के हाथों ही क्यों हुआ है? पता है क्यों?

क्यों कि औरतें उन पुरुषों को जन्म देती हैं.

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लल्लनटॉप के स्टेज पर भी अन्नू कपूर जी आये, यहाँ उनकी कही बातों में एक ही बात याद है “चाहे किसी भी उम्र का इन्सान हो, उसे कभी सजना-संवरना नहीं छोड़ना चाहिए” कहानी भी शेयर की “टैगोर और गाँधी की जिसमें गाँधी ने टैगोर से पूछ लिया था कि ढलती उम्र में क्यूँ सजना-संवरना? टैगोर का जवाब था की ढलती उम्र में नहीं संवरा तो ये लोगों के साथ हिंसा होगी”
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इस बुकलेट पर वही बैठ के, खड़े होके, लेट के, चाहे जैसे लिखनी हो ,कहानी लिख के देना था.
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एक प्रतिभागी जिनका नाम पूछना मैं भूल गया और फ़ोटो लेते वक़्त इन्हें ये आदेश दिया कि आप कैमरे की तरफ़ मत देखिए.
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ये आदमी(?) 13:14 बजे से कहानी लिखना शुरू किया है और 16:15 बजे तक लिखा है, इस दरम्यान इसने 4 कप चाय, एक बोतल पानी और एक 40 रूपये की डेरी मिल्क चाकलेट डकार गया जो कि ये किसी और के लिए लाया था.
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तल्लीनता किसे कहते हैं, उस दिन जाना मैंने इन साहब को देखकर. इनकी कहानी भी पढ़ने की ख्वाहिश है.
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मेरी कहानी का एक भाग. कहानी का नाम- “अमृता-इमरोज़ और भाग्यश्री…वो एक लड़का भी”
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इस आर्ट्स सेंटर कभी जाना हुआ तो इस दीवार को गौर से देखना भूलियेगा नहीं, वादा कीजिए 🙂
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मैं कहीं भी रहूँ मेरे हिस्से का सूरज मुझे ढूंढ ही लेता है, इस बात का यकीन मानिए.
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…देखना है ज़ोर कितना
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यहाँ आभार व्यक्त कर देता हूँ इस काबिल ग्रुप को उस प्ले के लिए…
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लल्लनटॉप के मंच से कविताओं को गीतों में पिरोकर चिन्मयी त्रिपाठी और उनके हमसफ़र ने बांधा समां. कहानी लिखते हुए मुझे उठाना पड़ा था बीच से ही इन्हें देखने के लिए. शिवमंगल सिंह सुमन जी की कविता को आवाज़ दी थी इन्होंने. इन दोनों जोड़ियों से पूछा गया कि एक ही प्रोफ़ेशन में होने के क्या कान्स और प्रोस है? जवाब था “हम उब जाते हैं कभी-कभी गानों से, ऑटो वाला गाना चलाता है तब अंदर से गुस्सा आता है और उससे कहना पड़ता है कि गाना बंद कीजिए”
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रूहदारियां, रश्मि अग्रवाल, इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी मंच से इन्होंने गाया और सुनने वाले झूमे, रूह भी झूम रही थी लोगों की. काश इसका प्रमाण दे पाता मैं……

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जब दीप जले आना…जब शाम ढले आना संगीत मिलन का भूल ना जाना मेरा प्यार ना विसराना….. येशुदास जी को सुनना भूले तो नहीं हैं आप? ऐसा पाप हो गया है तो आज से ही बंद कर दो. 🙂

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मैंने गुलज़ार साहब को जीवंत किया, इन भाई साहब को ये कह कर कि आप फ़ोटो लेते रहिये जब तक मैं मना न कर दूं. ये मान भी गए और बाद में पूछा भी कि फोटोग्राफी कहाँ से सीख रहे हों? कहाँ से सीख रहा हूँ? मुझे तो पता चले पहले…..ज्यादा हो गया न ये…..

 

 

 

 

 

 

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हुसैन हैदरी, रमणीक सिंह,पुनीत शर्मा, पंकज शर्मा… इन युवा कवियों ने जो समां बाँधी है ना….इसी सेशन के समानांतर जावेद अख्तर साहब का सेशन चल रहा था. भीड़ को उसी सेशन ने अपने पास बुला लिया था पर मैंने और मेरे ‘साहित्य आजतक’ के कुछ साथियों ने इन्हें ही सुनते रहने को चुना. इनकी कविता पाठ को आप विडियो लिंक से ज़रूर सुनिए. यहां सुनिए, सुनते हुए देख भी सकते हैं इन्हें

इस कविता पाठ और ली गयी मेरी तस्वीर में एक बात है जो बतानी है मुझे. जब पंकज शर्मा अपनी नज़्म पढ़ रहे थे “मुझसे प्रीत निभाओगी क्या?” मैं तकिए के सहारे जिस अंजान प्रेमी युगल के पीछे बैठा हुआ था, पंकज शर्मा की नज़्म की एक-एक लाइन और इस प्रेमी-युगल के हाव-भाव….. और क्या कहूं अब?

नज़्म महसूस कीजिए-

जब मैं तन्हा हो जाऊंगा

गुमनामी में खो जाऊँगा

दुनिया के बंधन टूटेंगे

जब मेरे मुझसे रूठेंगे

तब मेरे दीवान से चुनकर

कोई नज़्म सुनाओगी क्या?

मुझसे मिलने आओगी क्या?

मुझसे प्रीत निभाओगी क्या?

अब आप ही बताइए कि मुझे जाना चाहिए था जावेद अख्तर जी के सेशन में? बाद में पता चला जावेद साहब के सेशन की बेबाकी भरे जवाब. वही नाम बदलना शहरों के, मुहब्बत के…. दीवानों के……अफसानों के…सरकारों के…

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कुछ बताना है इस तस्वीर के बारे में? बीते सावन में ही गाँव में लगने वाले मेले का वक़्त बीता है. इसबार दिल्ली सही 🙂
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दुसरे वाले डेरी मिल्क का क्या किया मैंने? कायदे से तो मुझे बताना नहीं चाहिए…..और बताऊंगा भी नहीं….. हाहाहा
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ये है ‘साहित्य आजतक-2018’ का हासिल क़िताबें जो बदलती हैं ज़िन्दगी….

…और भी बहुत कुछ हासिल हुआ जो लिखा नहीं जा सकता, मेरी आँखों में है वो.

अंकल जी मैथिली ठाकुर के सेशन के बाद मिले भी, मैंने उनका नंबर लिया और उनसे कहा कि “जश्न-ए-रेख्ता” में मिलेंगे ना?

“लल्लनटॉप कहानी कम्पटीशन” के एक सहभागी ‘श्रीपाल भाई’ जो कि जोधपुर से हैं और वे भी सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे हैं.उनका पिलाया गया चाय मेरे पर कर्जा हो गया है.

“लल्लनटॉप” के मंच से मेरा कविता पाठ करना और जब उद्घोषक ने मेरा नाम जाना तो कहा कि भारत में भी मंटो. उद्घोषक की आश्चर्य भरी आँखें ज़हन में देर तक टिकने वाली है.

कहानी लिखने के दरम्यान एक 80 पार कर चुकी दादी अम्मा मेरे क़रीब आयी और बोली कि बहुत देर से ये क्या लिख रहे हो? उन्हें जवाब मिला और मुझे ये तारीफ़ कि लिखावट कितनी अच्छी है.

अंकल जी से सबक मिला कि लिखने से ज्यादा ज़रूरी पढना है.

अंजान-प्रेमी युगल के हाव-भाव ने वो सीखाया जो मैं किसी प्रेम-ग्रन्थ को भी अगर घोल के पी जाऊं तो शक ही रहेगा कि क्या हासिल हुआ.

अंत में लौटते वक़्त मैंने अपना विस्तार पाया…उन चंद लम्हों पहले की छूटी हुई नज़ारों,सबक और अनगिनत चीज़ों में…..

आख़िरी बात-

14-16 दिसम्बर 2018 को मिले रहे हैं ना हम…अगली कहानी का हिस्सा बनने के लिए.

मिलना कहाँ है? अरे….वहीं…. जश्न-ए-रेख्ता के पांचवें संस्करण में, मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम, न्यू दिल्ली में…इत्ता आसां तो है.

🙂

शुरुआत :)

एक नयी शुरुआत है मेरे उन पलों से रूबरू होने के लिए जो पीछे छूट चुकी हैं या छूट रही हैं. उन पलों की जरुरत है फ्यूल के जैसे मेरी ज़िन्दगी की गाड़ी के लिए, जब गाड़ी किसी राह पर चलने से मना कर दे, रूठ जाए मुझसे ही या मुझे सजा दे मेरे किए पर…तब इन्हीं पलों के आगे झुकता हूँ और ये मुझे आगे धकेल देती हैं एक हद तक.

आप उन पलों से क्या हासिल करेंगे यह तो आपके ऊपर है पर यहाँ जो वक़्त आप जाया करेंगे उसकी भरपाई आपके चेहरे की कुछ मीटर की मुस्कुराहट करेगी ! इतना यकीन तो मैं दिला ही सकता हूँ 🙂

wazirabaad

🙂